Sunday, 28 March 2021

"पाँच-सात-पाँच"

1.
हमने माना
पानी नहीं बहाना
तुम भी मानो।
2.
छेड़ोगो तुम
अगर प्रकृति को
तो भुगतोगे।
3.
जल-जंजाल
न बने जीवन का
जरा विचारो।
4.
सूखा ही सूखा
क्यों है चारों ओर
सोचो तो सही।
5.
पानी या खून
हर बूँद अमूल्य
मत बहाओ।
6.
खून नसों में
बहता अच्छा, नहीं
सड़क पर।
7.
सुनो सब की
सोचो समझो और
करो मन की
8.
घड़ी की सुईं
चलकर कहती
चलते रहो।
9.
रोना हँसना
बोलो कौन सिखाता
खुद आ जाता।
10.
सूखा ही सूखा
प्यासा मन तरसा
हुआ उदासा।
11.
भ्रष्टाचार से
देश को बचाएंगे
संकल्प करें।
12.
आतंकवाद
समूल मिटाना है
मन में ठानें।
13.
नैतिक मूल्य
होते हैं सर्वोपरि
मन से मानें।
14.
गेंहूँ जौ चना
कैसे हो और घना
हमें सोचना।
15.
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।
16.
देश बढ़ेगा
अपने दम पर
आगे ही आगे।
17.
अपना घर
तन-मन-धन से
स्वच्छ बनाएं।
18.
विद्या मन्दिर
नारों का अखाड़ा है
ये नज़ारा है।
19.
सब के सब
एक को हटाने में
एक मत हैं।
20.
पहरेदार
हटे, तो काम बने
हम सब का।
21.
नहीं सुहाते
दोनों घर, हमको
बिन कुर्सी के।
22.
नारी सुरक्षा
आकाश हुआ मौन
मत चिल्लाओ।
23.
सूखा ही सूखा
बादल हैं लाचार
रोती धरती।
24.
दीप तो जले
उजाला नहीं हुआ
दीप के तले।
25.
जागते रहो
कह कर, सो गया
पहरेदार।
26.
फसल कटी
बेचारे किसान की
ब्याज में पटी।
27.
हवा बचाओ
विषैली न बनाओ
मान भी जाओ।
28.
कर्तव्य करो
अधिकार मिलेगा
खुद व खुद।
29.
घड़ी की सुईं
टिक टिक कहती
टिकती नहीं।
30.
डूबता हुआ
सूरज बोल गया
कल आऊँगा।
31.
सूखे पलाश
बात है कुछ खास
मन उदास।
32.
दिवाली पर
सब दीप जलाएं
नहीं पटाखे।
33.
बिल की आग
बिलबिलाते कीड़े
भागमभाग।
34.
जब जब भी
मेरा मन पिघला
आँसू निकला।
35.
एक दो तीन
चार पाँच छःसात
आठ नो दस।
***
-आनन्द विश्वास


Tuesday, 9 March 2021

“नेकी कर दरिया में डाल”

नेकी
 कर  दरिया में  डाल,
चलता जा तू अपनी चाल।
    तेरे   आगे   तेरी   मंज़िल,
    पूछ न  तू पाँवों  के  हाल।
चौविस  घण्टे  चारों  याम,
आगे कदम बढ़ा हर हाल।
    ये जग ग़म से अटा पड़ा है,
    आँसू ले ले खुशी उछाल।
पग-पग काँटे, बीहड़ जंगल,
मुश्किल का हल स्वयं निकाल।
    गहन तिमिर घनघोर अँधेरा,
    तम के आगे जला मशाल।
जाति-पाँत से ऊपर उठकर,
अपना मन तू बना विशाल।
    तेरे   ही   तुझको   खींचेंगे,
    कभी न करना कोई मलाल।
संघर्षों  का  नाम  जिन्दगी,
संघर्षों  में  खुद  को  ढाल।
    सुख-दुःख तो आते जाते हैं,
    अपने आँसू  स्वयं सम्हाल।
    -आनन्द विश्वास


Friday, 5 March 2021

“कर-दर्शनम्”

सुबह
 सबेरे  उठकर  बच्चो,
सर्वप्रथम  कर-दर्शन करना।
      लेकर प्रभु का नाम और फिर,
      दौनों कर मस्तक पर रखना।
कर के अग्रभाग में बच्चो,
माँ लक्ष्मीं जी स्वयं विराजें।
      मध्य भाग  में  मातु  शारदे,
      और  मूल में  हरी  विराजें।
कर-दर्शन  हरि  दर्शन  होता,
दर्शन  से मन  निर्मल  होता।
      धन विद्या औ शुद्ध कर्म का,
      बीज अंकुरित  मन में होता।
सब तीर्थों  का वास  करों में,
दिव्य शक्ति-मय हाथ तुम्हारे।
      शुद्ध कर्म हों सारे दिन भर,
      सदा शक्तियाँ साथ तुम्हारे।
दौनों कर में शक्ति अपरिमित,
निर्भय  होकर   आगे  बढ़ना।
      धरती माँ को कर प्रणाम फिर,
      सीधा  पग धरती पर धरना।
सूर्योदय    से   पहले  उठकर,
सूरज का  अभिनन्दन करना।
      स्वर्णिम ओजमयी किरणों से,
      अपना जीवन उज्ज्वल करना।
            -आनन्द विश्वास 

Tuesday, 23 February 2021

"टिम-टिम करते तारे कहते"

टिम-टिम   करते  तारे  कहते,
तुम भी बच्चो जग में चमको।
        सूरज   से   तेजस्वी   बनकर,
        दूर भगाओ  जग से  तम को।
जहाँ  कहीं  भी  अंधकार हो,
दीप  सरीखे  जलकर दमको।
        तुम तो  बच्चो शक्ति-पुंज हो,
        कभी न छोटा आंको खुद को।
देखो, हँस  कर  फूल  बुलाते,
बनकर खान गुणों की महको।
        चीं-चीं करती चिड़ियाँ कहतीं,
        उड़ो गगन में, हम  से चहको।
नदियाँ,  झरने,  पर्वत,  सागर,
अनगिन सीख सिखाते तुमको।
        मन-मन्दिर को स्वच्छ बनाकर,
        पावन  कर  लो अपने मन को।
                    ***
-आनन्द विश्वास  


Monday, 15 February 2021

“दो गज दूरी, मास्क जरूरी”

बिल्ली   बोली,  चूहे  राजा,
आजा,बिल से बाहर आजा।
        बाहर  देखो  मस्त  पवन  है,
        बिल के अन्दर बड़ी घुटन है।
मौसी  रब  से  जरा  डरो ना,
बे मतलब की बात करो ना।
        बिलकुल झूँठा बोल रही हो,
        बिना मास्क के डोल रही हो।
लॉकडाउन के चलते, मौंसी,
घर से नहीं निकलते, मौंसी।
        जल्दी-पल्दी  घर को जाओ,
        बिना मास्क मत बाहर आओ।
पहले कोविड  टैस्ट कराओ,
फिर टीका लगवाकर आओ।
        एक  बात जो  बड़ी जरूरी,
        दो गज की तुम रखना दूरी।
बात तुम्हारी सच है राजा,
मगर पेट में बजता बाजा।
        कैसे    इच्छा   होगी  पूरी,
        दो गज दूरी, मास्क जरूरी।
***
-आनन्द विश्वास


Wednesday, 2 September 2020

"मिटने वाली रात नहीं"

दीपक की है क्या बिसात, सूरज के वश की बात नहीं,
चलते-चलते  थके  सूर्य, पर  मिटने  वाली  रात  नहीं।
चारों ओर  निशा का शासन,
सूरज भी  निस्तेज  हो  गया।
कल तक जो  पहरा देता था,
आज वही चुपचाप सो गया।
सूरज  भी  दे दे  उजियारा , ऐसे  अब  हालत  नहीं,
चलते-चलते थके  सूर्य, पर मिटने  वाली  रात नहीं।
इन कजरारी  काली  रातों  में,
चंद्र-किरण  भी लुप्त  हो  गई।
भोली - भाली गौर  वर्ण  थी,
वह रजनी भी  ब्लैक  हो गई।
सब  सुनते  हैं, सहते  सब, करता कोई आघात नहीं,
चलते-चलते  थके  सूर्य, पर मिटने  वाली  रात  नहीं।
सूरज  तो   बस  एक  चना  है,
तम का शासन  बहुत  घना है।
किरण-पुंज  भी   नजरबंद   है,
आँख  खोलना सख्त मना  है।
किरण-पुंज को मुक्त करा दे, है कोई नभजात नहीं,
चलते-चलते थके  सूर्य, पर मिटने  वाली  रात  नहीं।
हर   दिन   सूरज   आये   जाये,
पहरा   चंदा   हर  रात  लगाये।
तम  का  मुँह काला  करने  को,
 
हर शाम दिवाली दिया जलाये।
तम भी नहीं किसी से कम है, खायेगा वह मात नहीं,
चलते-चलते थके  सूर्य, पर मिटने वाली  रात  नहीं।
ढह सकता है  कहर तिमिर का,
नर-तन  यदि मानव  बन जाये।
हो   सकता   है  भोर   सुनहरा,
मन का दीपक यदि  जल जाये।
तम के मन  में दिया जले, तब  होने वाली रात नहीं,
चलते-चलते  थके  सूर्य, पर  मिटने वाली रात नहीं।
***
यह कविता मेरे कविता-संग्रह 
"मिटने वाली रात नहीं" 
से ली गई है।
-आनन्द विश्वास


Saturday, 29 August 2020

"शासन का संयोजन बदलो"


सूरज,
जो हमसे है दूर, बहुत ही दूर।
और फिर चलने से मजबूर,
पंगु बिचारा, हिलने से लाचार,
करेगा कैसे तम संहार।
जिसके पाँव धरा पर नहीं,
रहे हो रंग महल के नील गगन में।
उसको क्या है फ़र्क,
फूल की गुदन, और शूल की खरी चुभन में।
जो रक्त-तप्त सा लाल, दहकता शोला हो,
वो क्या प्यास बुझाएगा, प्यासे सावन की।
जिसका नाता, केवल मधुमासों तक ही सीमित हो,
वो क्या जाने बातें, पतझर के आँगन की।
जिसने केवल दिन ही दिन देखा हो,
वो क्या जाने, रात अमाँ की कब होती है।
जिसने केवल दर्द प्यार का ही जाना हो,
वो क्या जाने पीर किसी वेवा की कब रोती है।
तो, सच तो यह है -
जो राजा जनता से जितना दूर बसा होता है,
शासन में उतना ही अंधियार अधिक होता है।
और तिमिर -
जिसका शासन ही पृथ्वी के अंतस् में है,
कौना-कौना करता जिसका अभिनन्दन है।
दीपक ही -
वैसे तो सूरज का वंशज है,
पर रखता है, तम को अपने पास सदा।
वाहर से भोला भाला,
पर उगला करता श्याह कालिमा,
जैसे हो एजेंट, अमाँ के अंधकार का।
और चंद्रमा-
बागडोर है, जिसके हाथो, घोर रात की,
पहरेदारी करता-करता सो जाता है,
मीत, तभी तो घोर अमावस हो जाता है।
तो, इसीलिए तो कहता हूँ,
शासन का संयोजन बदलो।
और धरा पर, नहीं गगन में,
सूरज का अभिनन्दन कर लो।
-
आनन्द विश्वास