Friday, 28 March 2014

हम मोटी चमड़ी वाले हैं.

हम मोटी चमड़ी वाले हैं.
...आनन्द विश्वास
हम  मोटी  चमड़ी वाले हैं, हम नहीं  सुधरने वाले हैं।
चलती है सत्ता  हम से ही,  हम सत्ता  के रखवाले हैं।
काला   धन   हमने  पाया  है,
मुश्किल  से  इसे  कमाया  है।
कितना  लम्बा ये जाल  बुना,
मुश्किल  से  इसे   बनाया  हैं।
चुल्लू में  सागर पी जायें, हम ऐसे ज़ालिम विषधर हैं।
छोटी मछली, मोटी मछली, सागर में अजगर पाले हैं।
तुमको  जो  करना  है  कर  लो,
हमको  जो  करना  है  कर  लें।
तुम कह  कर मन हल्का कर लो,
हम  अपना  घर  थोड़ा भर  लें।
मत और न हमको तंग करो, हमसे ना कोई जंग करो।
हम अब  तक  खाते आये हैंआगे भी खाने  वाले  हैं।
तुमको  क्यों  दर्द  हुआ  करता,
हर  जन  तो यही दुआ करता।
धन - दौलत  सबके  घर  आये,
खुशहाली  घर - घर  में  छाये।
तुम संग हमारे आ जाओ,पल भर में दौलत पा जाओ।
हम साथ निभाते आये हैं, हम साथ  निभाने  वाले हैं।
तुम  कहते  हो  जिसे  जेल  है,
जेल  नहीं  है,  खेल  यही  है।
जनता  से   रक्षा   मिलती  है,
फिर  कड़ी  सुरक्षा  मिलती है।
जिन डॉन-डकैतों से दुनियाँ, डरती  है अरु थर्राती  है,
उनके संग अपना मेल-जोल, वे ही तो हमें सम्हाले हैं।
कितने दिन से तुम खाँस रहे,
मेरे  भैया  कुछ  ले  लो  ना।
पकड़ो  तुम मेरा  हाथ  सखे,
बहती गंगा, मुँह धो  लो ना।
सुख-चैन तुम्हारे द्वार खड़ा,आगत का स्वागत कर लो ना,
ये  दुनियाँ  आनी-जानी  है, हम  सब भी  जाने वाले हैं।
काला  धन है, काला  मन  है,
मुँह भी तो  अपना  काला है।
सूरदास  की   कमरी  अपनी,
कोई  रंग  न  चढ़ने वाला है।
पुस्तैनी-पेढ़ी है अपनी, अपना  ही  सिक्का  चलता है,
अपना ही जलवा यहाँ-वहाँ, बाकी तो जलने वाले हैं।
ये   मंज़िल  है   नहीं  हमारी,
ये    तो     सिर्फ   पड़ाव   है।
सिक्का  अपना  चले  विश्व  में,
ऐसा     अपना     ख्वाब   है।
बहुत सुनी जनता की गाली और बहुत सी लम्पट बातें,
अब और न  सहने वाले  हैं, हम जाँच  कराने वाले  हैं।
...आनन्द विश्वास.


Saturday, 8 March 2014

*अबोध बालक*

*अबोध बालक*
(यह कहानी मेरे बाल-उपन्यास *देवम बाल-उपन्यास* से ली गई है।)
...आनन्द विश्वास

 *अबोध बालक*
देवम का घर स्कूल से थोड़ी ही दूरी पर है। वह अक्सर अपने साथियों के साथ पैदल ही या कभी-कभी साइकिल से स्कूल आया-जाया करता है। और जब कभी पापा के पास समय होता तो वे स्कूटर या कार से उसे स्कूल छोड़ देते और आते समय वह पैदल ही अपने साथियों के साथ वापस आ जाता।
शाम को देवम स्कूल के मैदान में फुटबॉल खेलने जाता, वह स्कूल की टीम में भी खेलता। शाम को देवम के स्कूल में पी.टी. सर अपनी देख-रेख में सभी खिलाड़ियों को खिलाते और प्रशिक्षण भी देते। देवम का यह नित्य का नियम है शाम हुई नही कि देवम स्कूल के मैदान पर।
देवम हॉकी, फुटबॉल तथा क्रिकेट बहुत अच्छा खेलता, स्कूल के सभी शिक्षक, छात्र उसका सम्मान भी करते। और जब कभी भी देवम की टीम जीतती तो उसमें देवम का योगदान अवश्य होता। देवम अपनी स्कूल की फुटबॉल टीम का कैप्टिन भी है।
आज स्कूल में फुटबॉल के टूर्नामेंट का फाइनल मैच सौरभ विद्यालय से है। स्कूल में काफी दर्शक और स्कूल के छात्र भी आये हुये है।
शहर के नेशनल डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राजेश गौड़ अतिथि-विशेष के रूप में आये थे। जो यूनिवर्सिटी स्पोर्टस् कमेटी के सदस्य भी हैं और किसी समय वे अच्छे खिलाड़ी भी रहे थे।
देवम के स्कूल की टीम ने सौरभ विद्यालय की टीम को दो गोल से हरा कर शील्ड जीत ली। जिसमें एक गोल देवम ने और दूसरा गोल उसके साथी राहुल ने किया।
सभी दर्शक देवम और राहुल के खेल की बहुत-बहुत तारीफ़ कर रहे थे। जिनके पासिंग कम्बीनेशन से ही गाँधी विद्यालय जीत सका। अतिथि विशेष को भी देवम और राहुल का खेल बहुत पसंद आया। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने देवम और राहुल के खेल की प्रशंसा भी की थी।
जीतने वाले तथा हारने वाले दोनों टीम के सभी खिलाड़ियों को अतिथि-विशेष के द्वारा पुरस्कार का वितरण किया गया और शील्ड गाँधी विद्यालय के कैप्टिन देवम और साथी खिलाड़ियों को प्रदान की गई। शाम का समय हो चुका था। खेल खत्म होने के बाद देवम और उसके साथी पैदल ही अपने घर की ओर आ रहे थे।
इन्हीं के साथ कुछ बच्चे भी खेलते-खेलते मस्ती में चल रहे थे। शायद वे कुछ खेल के मूड में रहे होंगे, वे पत्थर उठा कर थोड़ी दूर पड़े, दूसरे पत्थर को मार कर अपना निशाना लगा रहे थे। और इस प्रकार शर्त लगा कर वे कभी जीतते तो कभी हारते, और अपने घर की ओर बढते जा रहे थे।
उसमें से एक ने कहा- अच्छा सामने उस पत्थर पर निशाना लगा। और फिर दूसरे ने पत्थर हाथ में लेकर निशाना मारा। पत्थर ठीक लक्ष्य पर लगा। अच्छा, चल तेरे सात पोइंट हो गये।
अच्छा, चल अब तू उस विजली के खम्भे पर निशाना लगा। और इस बार फिर निशाना सही बैठा, इस पर दूसरे का एक पोइंट और बढ़ गया। और अब इस बार लक्ष्य था सड़क के दूसरी ओर खड़े टेलीफोन के खम्भे का।
दोनों के हाथ में पत्थर थे और अर्जुन की भाँति लक्ष्य की ओर निशाना। उन्होने सड़क के दूसरी ओर खड़े टेलीफोन के खम्भे की ओर पत्थर फेंके।
पत्थर हाथों से निकल चुके थे, तभी तेजी से दौड़ती हुई जीप सड़क पर गुजरी और पत्थर जीप-चालक के सिर पर जा लगा।
एक जोरदार चीख के साथ ही ड्राइवर जीप का सन्तुलन खो बैठा। और असंतुलित जीप, साइकिल को रौंदती हुई, स्कूटर को टक्कर मार कर सड़क के किनारे खड़ी बस से जा टकराई।
जीप में बैठे हुये पुलिस के दारोगा तथा तीन सिपाहियों को काफी चोट लगी। बड़ी मुश्किल से जीप में फँसे लोगों बाहर निकाला गया। काफी लोग लहू-लुहान हो गये थे।
साइकिल पर स्कूल का ही छात्र राहुल था। जो स्कूल से मैच खेल कर घर वापस जा रहा था। उसकी साइकिल के ऊपर से जीप का अगला पहिया निकला गया था और राहुल को भी बहुत चोट आई। वह बेहोश हो  गया था और चल भी नहीं सकता था।
राहुल, गाँधी विद्यालय का छात्र और देवम का परम मित्र भी। देवम और राहुल दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे। राहुल स्कूल टीम में मैच खेल कर वापस घर जा रहा था। एक गोल उसने भी किया था।
अपने साथी राहुल को घायल अवस्था में देख कर देवम एक पल के लिये तो किं कर्तव्यम् विमूढ ही हो गया और दूसरे क्षण ही उसने त्वरित निर्णय लेते हुये अपने दो साथी विजय और आकाश से कहा कि तुम तुरन्त इसकी सूचना स्कूल में जाकर आरती मैडम को दो और मैं राहुल को ले कर अस्पताल पहुँच रहा हूँ।
इधर दो तीन लोगों की सहायता से देवम ने राहुल को रिक्शे में बैठा कर अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की। कुछ लोग कहने लगे कि पहले पुलिस केस करना पड़ेगा फिर अस्पताल ले जाना सम्भव होगा।
पर देवम ने इन लोगों की एक न सुनी और राहुल को अस्पताल पहुँचा कर तुरन्त ही इलाज की व्यवस्था करवाई। अस्पताल के डॉक्टर देवम के पापा के परम मित्र थे अतः बहुत कुछ समस्या अपने आप ही हल हो गई।
और जब देवम ने डॉक्टर अंकल को बताया कि राहुल उसका परम मित्र है तो फिर इलाज की पूरी व्यवस्था डॉक्टर अंकल ने अपनी देख-रेख में ही की।
राहुल की अस्पताल में व्यवस्था कर देवम ने राहुल के घर जाकर सूचना दी और राहुल की माँ को अपने साथ लेकर वापस अस्पताल आ गया। राहुल की माँ का रोते-रोते बुरा हाल हो गया था। पर होनी को कौन टाल सकता है ? आदमी इसके आगे विवश हो जाता है।
उधर घटना-स्थल पर देखते ही देखते हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठी हो गई। सारे शहर में हर जगह यही चर्चा थी कि गांधी विद्यालय के छात्र का जीप से एक्सीडेंट हो गया। जो सुनता, घटना-स्थल की ओर दौड़ पड़ता।
इसी अंतराल में पत्थर फेंकने वाले बच्चों का तो पता नहीं, किधर भाग गये। उन्हें किसी ने नहीं देखा और आम पब्लिक तो यह ही समझ रही थी कि पुलिस वाला जीप ड्राइवर गाड़ी का सन्तुलन खो बैठा जिसकी वजह से ऐक्सीडेन्ट हो गया। इसी कारण से भीड़ में पुलिस के प्रति क्रोध और आक्रोश व्याप्त था। सभी लोग पुलिस की आलोचना ही कर रहे थे।
पुलिस स्कूल के दो छात्र आलोक और अजय, जो कि आकाश के आगे-आगे चल रहे थे, को पकड़ कर थाने ले गई है। पुलिस का कहना था कि इन लड़कों ने ही जीप पर पत्थर फेंके थे जिस कारण दुर्घटना हुई।
जबकि पत्थर के विषय में इन्हें कुछ भी जानकारी नहीं थी। वे तो मैच के बारे में बातचीत करते हुऐ फुटपाथ पर चल कर अपने घर की ओर आ रहे थे।
उधर स्कूल में आरती मैडम को आकाश और विजय ने घटना के विषय में बताया तो वे पी.टी. सर और उन छात्रों को साथ ले कर घटना-स्थल पर पहुँची।
घटना स्थल पर पता चला कि पुलिस स्कूल के दो छात्र आलोक और अजय को पकड़ कर थाने ले गई है और उन पर आरोप था कि इन छात्रों ने पत्थर फेंक कर ड्राइवर को घायल कर दिया, जिस कारण दुर्घटना हुई।  यह खबर हवा की तरह पूरे शहर में फैल गई।
 तुरन्त ही प्रिंसीपल आरती मैडम, पी.टी.सर, विजय और आकाश थाने पहुँचे और उनके पीछे-पीछे था, अपार जन-समुदाय।
सभी लोगों में पुलिस के इस बेहूदे आचरण के प्रति आक्रोश ही नहीं प्रतिशोध भी था। वे पुलिस विरोधी नारे भी लगा रहे थे।
प्रिंसीपल आरती मैडम ने थानेदार को समझाया और आश्वासन दिया कि ये बच्चे इस तरह का काम कभी भी नहीं कर सकते।
कोई और कारण रहा होगा, इन बच्चों को घटना के विषय में कोई भी जानकारी नहीं है। ये दोनों छात्र हमारे स्कूल के अनुशासित और अच्छे छात्र हैं।
थाने पर बढ़ती भीड़ और परिस्थिति को अपने विपरीत होते देख थानेदार ने आलोक और अजय को छोड़ देना ही उचित समझा।
आलोक और अजय को थाने से छुड़ा कर प्रिंसीपल आरती मैडम, पी.टी. सर और सभी छात्र तुरन्त अस्पताल पहुँचे। और साथ ही इस घटना की पूरी सूचना उन्होंने स्कूल संचालक श्री रामदयाल जी को दी और उनसे तुरंत अस्पताल पहुँचने का आग्रह किया।
जीप के ड्राइवर के खिलाफ भिन्न-भिन्न धाराओं के  अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया था। ड्राइवर को पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले लिया था। पंचनामा हो गया था। कानून है, कानून तो अपना काम करेगा ही।
राहुल की माँ और उसके परिवार के लोग अस्पताल पहुँच चुके थे। राहुल की माँ का तो रोते-रोते बुरा हाल था। आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। प्रिंसीपल आरती मैडम ने राहुल की माँ को धैर्य बँधाया।
रामदयाल जी ने अस्पताल के अधिकारियों के साथ मिल कर शीघ्र ही अच्छे से अच्छे इलाज की व्यवस्था के लिये कहा तो डॉ. अविनाश ने कहा कि देवम ने यहाँ आ कर पहले ही से सब कुछ बता दिया है आप बिल्कुल भी चिन्ता न करें, राहुल का उपचार सही दिशा में चल रहा है। रामदयाल जी देवम के किये गये कार्यों से बड़े प्रसन्न हुये।
उधर घटना-स्थल पर बे-काबू हुई भीड़ को जब पता चला कि पुलिस स्कूल के दो छात्रों को पकड़ कर ले गई है तो भीड़ ने पुलिस की जीप को जला डाला और पुलिस के दमन विरोधी नारे लगाते हुये थाने की ओर चल पड़े।
भीड़ के केवल हाथ होते हैं और वे भी केवल विध्वंस करने वाले हाथ। वो कहाँ क्या कर बैठे किसी को पता नहीं होता। जगह-जगह उत्पात आगज़नी करते-करते भीड़ थाने पहुँच कर पत्थर मारी करने लगी। ऐसे में कुछ अवांछनीय तत्व भी इस भीड़ में शामिल हो गये।
लोगों ने थाने में घुस कर तोड़-फोड़ भी की। पुलिस के दमन कारी कृत्य के विरोध में जगह-जगह पर आगजनी की घटना होने लगी।
सी.आर.पी. और एस.आर.पी. की टुकड़ियाँ  बुलानी पड़ी। इतना ही नहीं कई जगह तो कर्फ्यू और धारा 144 भी लगानी पड़ी। तब कहीं जा कर शहर की व्यवस्था को कन्ट्रोल किया जा सका।
स्कूल के छात्र बहुत दुखी थे उनके प्रिय साथी राहुल का इलाज अस्पताल में हो रहा था। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था, जिस दिन स्कूल के दस बारह साथी राहुल से मिलने अस्पताल में न आते हों।
देवम तो रोज़ ही राहुल से मिलने जाता और किसी चीज की जरूरत होती तो उसे दे कर भी आता था। स्कूल के टीचर्स और प्रिन्सीपल भी समय निकाल कर जरूर आते।
लगभग चार पाँच दिन के बाद आठवीं कक्षा के दो छात्र रोहन और सोहन फूल का एक गुच्छा ले कर अस्पताल राहुल से मिलने पहुँचे। उनकी आँखों में आँसू थे और मन में ग्लानि के भाव।
उन्होंने रो-रो कर राहुल को बताया कि उन्हीं के कारण उस की यह दशा हुई है। असल में हम दोनों का पत्थर ही ड्राइवर के लग गया था जिस कारण जीप का एक्सीडेंट हो गया था।
राहुल भैया, आप हमें माफ कर दो, वैसे तो हम आपसे माफी के लायक भी नहीं हैं, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। भविष्य में हम कभी भी ऐसा खेल नहीं खेलेंगे जिसके कारण किसी को कोई कष्ट हो। हमारी वजह से ही आपको बहुत कष्टों का सामना करना पड़ा।
राहुल ने दोनों साथियों को गले लगा लिया और माफ कर दिया। रोहन और सोहन के सिर से जैसे एक बहुत बड़ा  बोझ उतर गया था। लेकिन वे आँसू, आत्मग्लानि और अफसोस के बोझ से दबे जा रहे थे।
अब उन्हें एहसास हो रहा था कि एक छोटी सी नादानी, नासमझी कितना बड़ा अहित कर सकती है, कितने लोगों को कष्ट पहुँचा सकती है।
यहीं तक नही, जब पुलिस वालों को सत्य का पता चला तो उन्होंने भी देवम और राहुल से अपनी गलती के प्रति दुख और अफसोस व्यक्त किया।
   काश !  समय रहते हम अपने बच्चों को कुछ अच्छे संस्कार और अच्छी बातें सिखा पाते ! अच्छे संस्कार देना आखिर, हमारा ही तो कर्तव्य है।
*****  
...आनन्द विश्वास  


Friday, 28 February 2014

*अक्षर-ज्ञान गंगा*

अक्षर-ज्ञान गंगा
(यह कहानी मेरे बाल-उपन्यास 
*देवम बाल-उपन्यास
से ली गई है।)
...आनन्द विश्वास
अक्षर-ज्ञान गंगा
सुबह के पाँच बजे और देवम का उठना, जैसे दोनों ही एक दूसरे के पर्याय हैं। विस्तर से उठकर, कर-दर्शन और फिर धरा-स्पर्श। फ्रेश होना और फिर अपने मित्र शुभम के साथ या फिर कभी-कभी घोष बाबू के साथ निकल जाना, मोर्निंग-वॉक पर। लगभग आधा घण्टा गार्डन में व्यायाम, जौगिंग, योगा और फिर घर वापस। और फिर स्कूल।
घर से गार्डन तक पहुँचने के लिए देवम को रास्ते में स्लम-एरिया से गुजरना पड़ता। लगभग दस-बारह झोंपड़ी होंगी। यूँ तो यहाँ होकर देवम रोज़ ही गुजरता था पर आज, लौटते समय उसने एक झोंपड़ी के सामने एक दस एक साल के बच्चे को पिटते हुए देखा।
बाप उसे पीट रहा था और बच्चा रोते-रोते कह रहा था, पापा, बस करो। अब और मत पिओ। हम बरबाद हो जाऐंगे। ये शराब हमें बरबाद कर देगी, कुछ नहीं बचेगा अपने पास।
और शराबी बाप, नशे में धत्त, जिसकी जबान और पैर दोनों लड़खड़ा रहे थे। चिल्ला कर बोला, “ मैं कमाता हूँ तो पीऊँगा भी, तू कौन होता है मुझे रोकने वाला ? ”
नहीं बापू, तुम्हें मेरी कसम जो तुमने और पी। बेटे ने आखिरी शस्त्र का प्रयोग किया।
पर बापू को होश हो तब न। वह नहीं रुका तो नहीं ही रुका। बच्चे की माँ भी कह-कह कर हार गई।
लोगों ने बताया, यहाँ तो अक्सर ऐसा होता ही रहता है। बस बेटा और बापू बदल जाते, स्थान बदल जाता है, घर बदल जाता है पर नाटक तो वही का वही ही रहता है। भीड़ इकट्ठी होती है और फिर छट जाती है, नाटक देख कर। नशे में धत्त बापू वहीं पड़ा रहा।
और सच ही तो है जब कोई काम-काज न हो तो आदमी से और क्या अपेक्षा की जा सकती है। बेकारी और भुखमरी का शिकार भी तो आखिर इन्हें ही तो होना होता है और फिर मँहगाई भी साथ दे, तब तो सोने में सुहागा।
खाली दिमाग शैतान का घर तो होता ही है और यदि शैतान उपद्रव न करे, तो कैसा शैतान ?
सारे दिन बस या तो एक दूसरे से झगड़ा करना, ताश के पत्ते खेलना और अगर कहीं से दो पैसे आ गये तो जुआ खेलना, यहाँ के लोगों की दिन-चर्या में शामिल होता।
इस घटना ने देवम के मन को झकझोर कर रख दिया। उसके मन में तरह-तरह के विचार भी आ रहे थे और वह समस्या का समाधान करना ही चाहता था।
स्कूल से घर आने के बाद, देवम ने झोंपड़-पट्टी में जाने का निश्चय किया। अपने मित्र शुभम को साथ ले कर चल पड़ा उनसे मिलने के लिये।
बापू तो काम पर गया था। लड़का और उसकी माँ घर पर थे। देवम और शुभम को देख कर पास के ही दो तीन लड़के-लड़कियाँ भी आ गये।
उन सब से पूछने पर पता चला कि उनमें से एक भी ऐसा नहीं था जो स्कूल जाता हो। कोई तो सुबह उठते ही प्लास्टिक और पोलीथीन की थैली बीनने चला जाता। उसे बेचने से जो पैसा मिलता, उसी से घर का गुजारा चलता। तो कोई सुबह से लेकर शाम तक चाय की दुकान पर कप-प्लेट धोने का काम करता। बाकी सब तो बस रखड़-पट्टी ही करते रहते, आवारा-गर्दी और कुछ नहीं। लड़कियाँ, अपनी माँ के साथ छोटा-मोटा काम कर लेतीं।
देवम के मन में विचार आया कि ये बच्चे दिन भर कोई काम भी नहीं करते हैं और केवल गंदी-गंदी आदतें ही सीखते रहते हैं क्यों न कोई ऐसी व्यवस्था की जाय जिससे कि इनका पढ़ना शुरू हो सके और इनमें अच्छे संस्कारों का सिंचन भी हो सके। साथ ही कोई ऐसी व्यवस्था हो जाय जिससे कि इनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सके।
देवम का विचार था कि जो पैसा उसे आतंकवादियों को पकड़वाने से सरकार द्वारा प्राप्त हुआ है, उस पैसे का यदि सही ढंग से उपयोग किया जाये तो इन लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार हो सकेगा, साक्षरता आ सकेगी। इनकी भटकी हुई जिन्दगी को नई दिशा मिल सकेगी और दशा भी सुधर सकेगी। इनके जीवन में भी नई रौशनी का आगमन भी हो सकेगा।
बाल-बुद्धि जितना सोच सकती थी, उससे अधिक ही सोचा था देवम ने। और फिर देवम ने अपनी इस समस्या को मम्मी को बताया। एक बार को तो मम्मी भी सोच में पड़ गईं कि कैसे हो सकेगा, इस समस्या का समाघान।
देवम को घोष बाबू का ख्याल आया। घोष बाबू, हाँ देवम के घर से तीसरा ही तो घर है घोष बाबू का। फौज के रिटायर्ड मेज़र। काफी बड़ा घर और रहने वाले अकेले इंसान। सौम्य सुभाव, मिलनसार, बच्चों के प्यारे घोष बाबू।
कोई बच्चा भूल से भी अगर उन्हें दादा जी कह दे तो मीठा-गुस्सा करते हुए कहते, “ नो नो नो, नो दादा जी, बस घोष बाबू और केवल घोष बाबू कहो। घोष बाबू अच्छा लगता है। और बच्चों के साथ बच्चे ही बन जाते घोष बाबू। बच्चे भी उन्हें घोष बाबू ही कहते और आत्मीयता का अनुभव करते।
देवम ने मम्मी से कहा, “ मम्मी, अगर घोष बाबू से बात की जाय और वे तैयार हो जायेंतो समस्या का हल सम्भव है।
वो कैसे ? ” मम्मी ने आतुरता के साथ पूछा।
मम्मी, घोष बाबू का इतना बड़ा मकान है और वह सब खाली ही तो पड़ा रहता है और वे कई बार हम सब बच्चों से कह भी चुके हैं कि सारा मकान खाली पड़ा रहता है बच्चो, तुम यहीं खेला करो। तुम यहाँ खेलोगे तो मेरा मन भी लगा रहेगा। देवम ने मम्मी को बताया।
उससे क्या होगा ? ” मम्मी ने फिर पूछा।
अगर उनके नीचे वाले दो रूम अपन को मिल जाएँ, तो बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था वहाँ हो सकेगी। ”  देवम ने मम्मी को समस्या-हल की युक्ति बताई।
देवम की बात मम्मी की समझ में आ गई और उन्होंने कहा, “ ठीक है आज शाम को तेरे पापा से पूछ कर बात कर लेते हैं। देखें वे क्या कहते हैं ? ”
शाम को देवम और देवम के पापा-मम्मी घोष बाबू के घर गये और अपनी योजना और साक्षरता मिशन के बारे में बताया तो वे खुश-खुश हो गए।
वे बोले, “ मैने तो इन बच्चा-पलटन को पहले ही बोला हुआ है कि ये इतना बड़ा घर खाली पड़ा रहता है और मेरे पास भी कोई काम नहीं है। बड़ा अच्छा रहेगा मैं भी देवम की हैल्प करूँगा। वैरी नाइस ऑइडिया ! ” खुश-खुश हो गए थे घोष बाबू। असल में वे भी तो कुछ ऐसा ही करना चाहते थे।
उम्मीद से अधिक ही मिल गया था देवम को। घोष बाबू के सहयोग ने तो देवम की कल्पना में पंख ही लगा दिए थे, अनंत आकाश में उड़ने के लिए। घोष बाबू के आश्वासन से देवम को बल मिल गया था।
देवम ने अपने सभी मित्रों को घोष बाबू के घर पर ही बुला कर अपनी अक्षर-ज्ञान योजना के विषय में बताया और राय माँगी तो सभी मित्रों ने इस भागीरथ-कार्य की सराहना की। और अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए।
शुभम ने कहा, “ हमें उनसे पहले बात करनी पड़ेगी कि वे पढ़ना भी चाहते हैं या नहीं।
यदि हम उनके लिए यहाँ पर कुछ नाश्ता बगैरा की व्यवस्था करें, तो वे जरूर आऐंगे। शीला ने प्रस्ताव रखा।
शर्लिन ने कहा, “ उनके लिए दो-दो जोड़ी कपड़ों की व्यवस्था की जाय ताकि वे खुशी-खुशी यहाँ आऐं। वर्ना उनमें गरीबी का एहसास रहेगा, और वे यहाँ नहीं आऐंगे। ” 
सभी कॉपी-किताबें, कम्पास बॉक्स, बैग आदि उन्हें फ्री दिया जाय। पिंकी की राय थी।
पढ़ाई के साथ-साथ यदि उन्हें थोड़ा पैसा हर महीने दिया जाय तो अच्छा रहेगा। सरल ने कहा।
हम अगर पैसा देंगे तो इनके पापा पैसे का गलत जगह पर भी उपयोग कर सकते हैं। क्यों न हम अपने डिपार्टमेंटल स्टोर्स के कूपन इन्हें दें, जो कुछ भी खरीदना हो वहाँ से खरीद सकते हैं। आटा, दाल, चावल, सब्जी आदि सब कुछ।  शीला ने कहा।
निश्चय किया गया कि एक दिन की उपस्थिति पर पंद्रह रुपये के कूपन, इस प्रकार महिने में चार सौ पचास रुपये की राशि प्रत्येक विद्यार्थी को दी जाय।
अपने साथियों के द्वारा दिए गए सभी परामर्श देवम और घोष बाबू को पसंद आए।
फिर सभी ने मिल कर एक मत से निर्णय लिया कि पैसे और पूरी व्यवस्था घोष बाबू की देख-रेख में रहेगी। साथ ही संस्था का नाम अक्षर-ज्ञान गंगा रखा गया।
सभी मित्रों के विचार और आयोजन का प्रारूप देवम ने अपने पापा और सोसायटी के सेक्रेटरी के समक्ष रखा तो उन्होंने पूरे सहयोग का आश्वासन दिया।
 घोष बाबू, देवम, शुभम और शर्लिन ने झोंपड़-पट्टी में पहुँच कर सभी बच्चों के सामने पढ़ाई और अक्षर-ज्ञान का प्रस्ताव रखा और बताया कि आपको कुछ भी खर्च नहीं करना है वल्कि पढ़ने पर आपको पैसे भी मिलेंगे। पहनने को कपड़े और किताब-कॉपी भी दी जाऐंगी। तो कुछ बच्चे तो पढ़ने के लिए तैयार हुए और कुछ नहीं।
जो बच्चे तैयार हुए उनके माता-पिता से भी बात की तो उन्होंने भी स्वीकृति दे दी। कुल ग्यारह बच्चे, नौ लड़के और दो लड़कियाँ, देवम के इस अभियान में शामिल हुए।
देवम खुश था। ग्यारह बच्चों को अक्षर-ज्ञान और अच्छे संस्कार देने में यदि वह सफल हो जाता है तो उसका प्रथम प्रयास कुछ कम नहीं होगा।
सबसे पहले तो घोष बाबू के दोनों कमरों को साफ करवाया गया और उसमें कुछ फर्नीचर, कुर्सी, टेबल आदि की व्यवस्था की गई। कुछ फर्नीचर घोष बाबू के घर से, कुछ देवम और मित्रों के घर से मँगवा लिया गया। घोष बाबू ने एक कमरा और खाली करवा दिया, जिसे कि ऑफिस के रूप में उपयोग किया जा सके। पानी इत्यादि की भी व्यवस्था कर दी गई।
सोसायटी में ही दो लड़कियाँ ऐसी थीं जिन्होंने बी.ए. बी.ऍड. किया हुआ था और जिन्हें नौकरी की तलाश थी। वे यहाँ पढ़ाने के लिए तैयार हो गईं।
 घोष बाबू के साथ देवम, शीला और शर्लिन ने बाजार जाकर सभी आवश्यक सामान खरीदा। ड्रेस के कपड़ा पसंद कर, दर्जी को दुकानदार से मिलवा दिया। ताकि आवश्यकता के अनुसार दर्जी दुकान से कपड़ा ले सके।
देवम ने सभी ग्यारह बच्चों को बुलवाया। दर्जी को बुलवा कर सभी का नाप दिलवा कर दो दिन में ड्रेस तैयार करने को कहा। बैग, किताबें और कम्पास बॉक्स भी बच्चों को दे दिये। और फिर दो दिन के बाद मंगल वार को ड्रेस ले जाने के लिए कह दिया।
उन्हें सूचना दी कि गुरुवार को अक्षर-ज्ञान गंगा का उदघाटन-समारोह प्रातः नौ बजे होगा। सभी समय पर आ जायें। बच्चे खुश थे शायद उनकी आँखों में उज्ज्वल भविष्य के सपने साकार हो रहे थे।
उनमें से दो-तीन लड़कों ने तो देवम से पूछा भी कि यदि कोई हमारे लायक काम हो तो जरूर बताएँ। उनके ऐसे व्यवहार ने देवम के मन को उत्साह और उमंग से भर दिया। ये गरीब लोग धन से गरीब होते हैं मन के तो कुबेर ही होते हैं। अपनों के लिए तो कलेजा निकाल कर ही रख देते हैं ये लोग। कोई इन्हें अपनाकर तो देखे।
गुरुवार गुरु-पूर्णिमा का पावन मंगल-मय शुभ-दिवस को अक्षर-ज्ञान गंगा का उदघाटन समारोह रखा गया। पुलिस-विभाग के अफसर और आई.जी. स्कूल की प्रिंसीपल आरती मैडम, स्कूल स्टाफ, देवम के दोस्त तथा सोसायटी के सभी लोगों को आमंत्रित किया गया।
सभी ने देवम के इस भागीरथ-प्रयास की प्रशंसा की तथा हर तरह के सहयोग का आश्वासन भी दिया। डोनेशन की गंगा बह निकली थी देवम के सहयोग के लिए।
देवम के स्कूल के संचालक श्री रामदयाल जी ने एक लाख रुपये का डोनेशन संस्था को दिया। पुलिस-विभाग के आई.जी. श्रीवास्तव साहब ने ग्यारह हजार रुपये, प्रिंसीपल आरती मैडम ने ग्यारह हजार रुपये और स्कूल के सभी साथियों ने अपनी-अपनी पॉकेट-मनी और ढेर सारी शुभ कामनाऐं।
प्रिंसीपल आरती मैडम ने देवम को हर प्रकार की सहायता का आश्वासन दिया और कहा कि मैं ऐसी संस्थाओं से बात करती हूँ, जो इस प्रकार के कार्यों में रुचि रखते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने पैसे को जन-हितकारी कार्यों में लगाना चाहते हैं। पर उन्हें सही और ईमानदार व्यक्ति की तलाश रहती है। ताकि पैसा सुपात्र तक पहुँचे। कई मेरे परिचित हैं।
पुलिस-विभाग के आई.जी.श्रीवास्तव साहब, देवम के इस कार्य से बड़े प्रभावित हुए और इस बात की उन्हें बड़ी खुशी थी कि इनाम में दिए गये धन का उपयोग अच्छे कार्य के लिए किया जा रहा है। विभाग को जब इस कार्य के बारे में पता चला तो उन्होंने काफी धन का कन्ट्रीव्यूशन कर देवम के पास पहुँचाया।
दूसरे दिन से सभी बच्चे, नये-नये कपड़े पहन कर, समय से पहले ही आ गये। उनकी आँखों में चमक और मन में कुछ करने का, कुछ बनने का उत्साह था।
 अक्षर-ज्ञान गंगा में शिक्षा का श्री गणेश किया गया। सर्व प्रथम ईश-वंदना की गई। फिर घोष बाबू ने थोड़ा योग और प्राणायाम कराया। और दोनों शिक्षिका-बहनों ने अक्षर लिखना सिखाया तथा घर पर अभ्यास के लिए भी काम दिया। कुछ नैतिक ज्ञान भी दिया गया। बीच में नाश्ते की व्यवस्था भी रखी गई।
एक सप्ताह भी न बीत पाया था जैसे-जैसे लोगों को पता चला, बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी। कई सेवा-भावी संस्थाओं ने देवम और घोष बाबू से सम्पर्क किया और सहयोग का आश्वासन भी दिया।
दलित सेवा समिति ने देवम और घोष बाबू  को दूसरे स्थान पर भी इसी प्रकार की संस्था खोलने का प्रस्ताव रखा। देवम और घोष बाबू ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर शीघ्र ही दूसरी शाखा खोलने का आश्वासन दिया।
पैसा और सहयोग समस्या नहीं थी। और यही तो सही काम का माप-दण्ड होता है। जन समुदाय का तन-मन-धन से समर्थन ही बताता है कि आपका कार्य और सोच सही  दिशा में है।
घोष बाबू का काम और जिम्मेवारी अब बढ़ गई थी। रिटायर्ड घोष बाबू, अब सबसे अधिक व्यस्त घोष बाबू हो गये थे। 
जो बच्चे झौंपड़-पट्टी के सामने ताश के पत्ते खेलते नज़र आते थे वे आज कॉपी पर लिखते और किताब पढ़ते दिखाई दिए। संस्कार बदलने में देर तो लग सकती है पर न बदले जा सकें, ऐसा तो नहीं है। लड़ते-झगड़ते बच्चों को प्यार से पढ़ते पाया गया।
अक्षर-ज्ञान गंगा   प्रगति की ओर अग्रसर हो गई थी। देवम का सपना साकार हो गया था।
*****