Monday, 9 October 2017

बाल-उपन्यास *बहादुर बेटी*

नीचे दिए गये  लिंक   पर क्लिक करके आप मेरे बाल-उपन्यास *बहादुर बेटी* को पूरा पढ़ सकेंगे। *बहादुर बेटी* के अभियान गीत *बेटी-युग* को महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल पुणे ने अपनी बालभारती पुस्तक के कक्षा-7 के पाठ्यक्रम में शामिल किया है। बाल-साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने का मेरा यह छोटा-सा प्रयास है।
*बहादुर बेटी*(बाल-उपन्यास)
कहानी है
एक
ऐसी
बहादुर बेटी
की
 Ø   जिसने पीएम के ड्रीमलाइनर विमान को आतंकवादियों के चंगुल से मुक्त कराया।
 Ø   जिसने अपनी दूरदर्शिता से तीन खूँख्वार आतंकवादियों को सरकार के हवाले कर दिया जिन्हें पकड़ने के लिए सरकार ने एक-एक करोड़ का इनाम घोषित किया हुआ था।
 Ø   जिसने घाटी में से आतंकवादियों और उनके आतंकी अड्डों को तहस-नहस कर डाला।
 Ø   जिसने पुस्तक और पैन को घर-घर तक पहुँचाकर घाटी में विकास की नई गाथा लिख दी।
 Ø   जिसने घाटी के रैड ब्लड ज़ोन का विकास कर देशी और विदेशी इन्वैस्टर्स के लिए रैड कॉर्पेटस् बिछवा दिए।
 Ø   जिसकी बदौलत एके-47 थामने वाले सशक्त युवा हाथों में आज ऐंड्रोंयड-वन आ गए।
 Ø   जिसकी बदौलत रायफल्स की ट्रिगर पर घूमने वाली सशक्त युवा-हाथों की अंगुलियाँ अब कॉम्प्यूटर और लैपटॉप के की-बोर्ड के साथ खेलने लगीं।
 Ø   जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर अनेक चैरिटी-शो करके स्लम-एरिया में रहने वाले गरीब और अनाथ बच्चों के लिए फ्री-रेज़ीडेन्शियल स्कूल खोले।
 Ø   जिसने अपने स्कूल का उद्घाटन पीएम श्री से करवाया और जिससे प्रेरणा लेकर स्वयं पीएम श्री ने भी हर स्टेट में इसी प्रकार के फ्री-रेज़ीडेन्शियल स्कूल खुलवाए।
 Ø   जिसने बेटी पढ़ाओ और देश बढ़ाओ आन्दोलन को गतिशील बनाया। उसका कथन था.. 
बेटा  शिक्षित, आधी शिक्षा,
बेटी  शिक्षित, पूरी  शिक्षा।
 Ø   जिसने बेटी के शिक्षा और सुरक्षा के अभियान को घर-घर तक पहुँचाकर सशक्त बनाया। उसका कहना था कि...
हार  जाओ  भले, हार मानो  नहीं।
तन से हारो भले, मन से हारो नहीं।
 Ø   तभी तो प्रेस और मीडिया की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश की बहादुर बेटी आरती बोल रही थी और पीएम का मन पिघल रहा था।
 Ø   विशाल देश के सशक्त पीएम की आँखों में पहली बार आँसू देखे गए। उन्हें रह-रह कर बस, यही ख्याल आ रहा था कि देश के बच्चे जिस काम को करने का मन बना सकते हैं और कुछ करने का बीड़ा भी उठा सकते हैं तो हम लोग इतनी बड़ी सत्ता और सामर्थ्य के होते हुए भी, उन स्लम-एरिया में रहने वाले गरीब बच्चों के उत्थान के विषय में, क्या सोच भी नहीं सकते।
 Ø   और मैं भी तो उसी तरह के बच्चों में से एक बच्चा हूँ जिसने अपने संघर्ष-मय जीवन के सफर की शुरुआत ही, स्लम-एरिया की उस छोटी-सी झोंपड़ी से की थी। वह भी तो कभी स्लम-एरिया में ही रहकर अपनी गुजर-बसर किया करता था और लैम्प-पोस्ट के नीचे टाट के बोरे पर बैठकर ही तो अक्सर गणित के सवाल किया करता था।
 Ø   बाल-उपन्यास की हर घटना अपने आप में रोचक बन पड़ी है और पाठक-गण को चिन्तन, मनन और सोचने के लिये विवश करेगी।
-आनन्द विश्वास 


https://drive.google.com/open?id=0B3yIfk194zUmRFowazY1N1BkdDQ

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-10-2017) को
    होय अटल अहिवात, कहे ध्रुव-तारा अभिमुख; चर्चामंच 2754
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आदरणीय शास्त्री जी का स्नेह ही तो मेरी साहित्यिक-यात्रा का *तोसा* है और इसीलिए मुझे अपनी मंजिल तक पहुँचने का पू्र्ण भरोसा है। गदगद हूँ ऐसा असीम स्नेह पाकर....
    ...आनन्द विश्वास

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