Friday, 1 September 2017

छूमन्तर मैं कहूँ...

छूमन्तर मैं कहूँ...
आनन्द विश्वास

छूमन्तर मैं कहूँ और फिर,
जो चाहूँ बन जाऊँ।
काश, कभी पाशा अंकल सा,
जादू मैं कर पाऊँ।

हाथी को मैं कर दूँ गायब,
चींटी उसे बनाऊँ।
मछली में दो पंख लगाकर,
नभ में उसे उड़ाऊँ।

और कभी खुद चिड़िया बनकर,
फुदक-फुदक उड़ जाऊँ।
रंग-बिरंगी तितली बनकर,
फूली नहीं समाऊँ।

प्यारी कोयल बनकर कुहुकूँ,
गीत मधुर मैं गाऊँ।
बन जाऊँ मैं मोर और फिर,
नाँचूँ, मेघ बुलाऊँ।

चाँद सितारों के संग खेलूँ,
घर पर उन्हें बुलाऊँ।
सूरज दादा के पग छूकर,
धन्य-धन्य हो जाऊँ।

अपने घर को, गली नगर को,
कचरा-मुक्त बनाऊँ।
पर्यावरण शुद्ध करने को,
अनगिन वृक्ष लगाऊँ।

गंगा की अविरल धारा को,
पल में स्वच्छ बनाऊँ।
हरी-भरी धरती हो जाए,
चुटकी अगर बजाऊँ।

पर जादू तो केवल धोखा,
कैसे सच कर पाऊँ।
अपने मन की व्यथा-कथा को,
कैसे किसे सुनाऊँ।


***

Thursday, 17 August 2017

*पाँच-सात-पाँच*

*पाँच-सात-पाँच*
(कुछ हाइकु)
1. 
हमने माना
पानी नहीं बहाना
तुम भी मानो।
2.
छेड़ोगो तुम
अगर प्रकृति को
तो भुगतोगे।
3.
जल-जंजाल
न बने जीवन का
जरा विचारो।
4.
सूखा ही सूखा
क्यों है चारों ओर
सोचो तो सही।
5.
पानी या खून
हर बूँद अमूल्य
मत बहाओ। 
 6.
खून नसों में
बहता अच्छा, नहीं
सड़क पर।
7.
सुनो सब की
सोचो समझो और
करो मन की
8.
घड़ी की सुईं
चलकर कहती
चलते रहो।
9.
रोना हँसना
बोलो, कौन सिखाता
खुद आ जाता।
10.
सूखा ही सूखा
प्यासा मन तरसा
हुआ उदासा।
11.
भ्रष्टाचार से
देश को बचाएंगे
संकल्प करें।
12.
आतंकवाद
समूल मिटाना है
मन में ठानें।
13.
नैतिक मूल्य
होते हैं सर्वोपरि
मन से मानें।
14.
गेंहूँ जौ चना
कैसे हो और घना
हमें सोचना।
15.
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।
16.
देश बढ़ेगा
अपने दम पर
आगे ही आगे।
17.
अपना घर
तन-मन-धन से
स्वच्छ बनाएं।
18.
विद्या मन्दिर
नारों का अखाड़ा है
ये नज़ारा है।
19.
सब के सब
एक को हटाने में
एक मत हैं।
20.
पहरेदार
हटे, तो काम बने
हम सब का।
21.
नहीं सुहाते
हमको दोनों घर
बिन कुर्सी के।
22.
नारी सुरक्षा
आकाश हुआ मौन
मत चिल्लाओ।
23.
सूखा ही सूखा
बादल हैं लाचार
रोती धरती
24.
दीप तो जले
उजाला नहीं हुआ
दीप के तले।
25.
जागते रहो
कह कर, सो गया
पहरेदार।
...आनन्द विश्वास