Friday, 20 October 2017

*मेरे पापा सबसे अच्छे* सम्पूर्ण पुस्तक

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप मेरी बाल-कविताओं की पूरी पुस्तक *मेरे पापा सबसे अच्छे* को पढ़ सकेंगे। जिसमें बालोपयोगी एवं ज्ञानवर्धक 25 बाल-कविताओं का समावेश किया गया है। पाठक और बाल-साहित्य के बीच की दूरी को कम करने का मेरा यह प्रयास है।
https://drive.google.com/open?id=0B3yIfk194zUmNF9uZnUwaWdLckk
...आनन्द विश्वास

1. मेरे पापा सबसे अच्छे
2. मेरा गुड्डा मस्त कलन्दर
3. ये देखो मेट्रो का खेल
4. सूरज दादा कहाँ गए तुम
5. आओ, चन्दा मामा आओ
6. एप्पल में गुण एक हजार
7. केला खाओ, हैल्थ बनाओ
8. फल खाओगे, बल पाओगे
9. दूध दही घी माखन खाओ
10. मेरी गुड़िया छैल-छबीली
11. जगमग सबकी मने दिवाली
12. ठंडी आई ठंडी आई
13. बच्चो,चलो चलाएं चरखा
14. गाँधी जी के बन्दर तीन
15. ऊपर वाले बहुत बधाई
16. बन सकते तुम अच्छे बच्चे
17. चलो, करें जंगल में मंगल
18. गरमागरम थपेड़े लू के
19. मेरे घर में बना बगीचा
20. हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई
21. सुबह सबेरे त्राटक योगा
22. छोटे-छोटे बच्चे हम हैं
23. मेरे जन्म दिवस पर मुझको
24. गरमागरम समोसे खाओ
25. चलो बुहारें अपने मन को
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Monday, 9 October 2017

बाल-उपन्यास *बहादुर बेटी*

नीचे दिए गये  लिंक   पर क्लिक करके आप मेरे बाल-उपन्यास *बहादुर बेटी* को पूरा पढ़ सकेंगे। *बहादुर बेटी* के अभियान गीत *बेटी-युग* को महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल पुणे ने अपनी बालभारती पुस्तक के कक्षा-7 के पाठ्यक्रम में शामिल किया है। बाल-साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने का मेरा यह छोटा-सा प्रयास है।
*बहादुर बेटी*(बाल-उपन्यास)
कहानी है
एक
ऐसी
बहादुर बेटी
की
 Ø   जिसने पीएम के ड्रीमलाइनर विमान को आतंकवादियों के चंगुल से मुक्त कराया।
 Ø   जिसने अपनी दूरदर्शिता से तीन खूँख्वार आतंकवादियों को सरकार के हवाले कर दिया जिन्हें पकड़ने के लिए सरकार ने एक-एक करोड़ का इनाम घोषित किया हुआ था।
 Ø   जिसने घाटी में से आतंकवादियों और उनके आतंकी अड्डों को तहस-नहस कर डाला।
 Ø   जिसने पुस्तक और पैन को घर-घर तक पहुँचाकर घाटी में विकास की नई गाथा लिख दी।
 Ø   जिसने घाटी के रैड ब्लड ज़ोन का विकास कर देशी और विदेशी इन्वैस्टर्स के लिए रैड कॉर्पेटस् बिछवा दिए।
 Ø   जिसकी बदौलत एके-47 थामने वाले सशक्त युवा हाथों में आज ऐंड्रोंयड-वन आ गए।
 Ø   जिसकी बदौलत रायफल्स की ट्रिगर पर घूमने वाली सशक्त युवा-हाथों की अंगुलियाँ अब कॉम्प्यूटर और लैपटॉप के की-बोर्ड के साथ खेलने लगीं।
 Ø   जिसने अपने साथियों के साथ मिलकर अनेक चैरिटी-शो करके स्लम-एरिया में रहने वाले गरीब और अनाथ बच्चों के लिए फ्री-रेज़ीडेन्शियल स्कूल खोले।
 Ø   जिसने अपने स्कूल का उद्घाटन पीएम श्री से करवाया और जिससे प्रेरणा लेकर स्वयं पीएम श्री ने भी हर स्टेट में इसी प्रकार के फ्री-रेज़ीडेन्शियल स्कूल खुलवाए।
 Ø   जिसने बेटी पढ़ाओ और देश बढ़ाओ आन्दोलन को गतिशील बनाया। उसका कथन था.. 
बेटा  शिक्षित, आधी शिक्षा,
बेटी  शिक्षित, पूरी  शिक्षा।
 Ø   जिसने बेटी के शिक्षा और सुरक्षा के अभियान को घर-घर तक पहुँचाकर सशक्त बनाया। उसका कहना था कि...
हार  जाओ  भले, हार मानो  नहीं।
तन से हारो भले, मन से हारो नहीं।
 Ø   तभी तो प्रेस और मीडिया की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश की बहादुर बेटी आरती बोल रही थी और पीएम का मन पिघल रहा था।
 Ø   विशाल देश के सशक्त पीएम की आँखों में पहली बार आँसू देखे गए। उन्हें रह-रह कर बस, यही ख्याल आ रहा था कि देश के बच्चे जिस काम को करने का मन बना सकते हैं और कुछ करने का बीड़ा भी उठा सकते हैं तो हम लोग इतनी बड़ी सत्ता और सामर्थ्य के होते हुए भी, उन स्लम-एरिया में रहने वाले गरीब बच्चों के उत्थान के विषय में, क्या सोच भी नहीं सकते।
 Ø   और मैं भी तो उसी तरह के बच्चों में से एक बच्चा हूँ जिसने अपने संघर्ष-मय जीवन के सफर की शुरुआत ही, स्लम-एरिया की उस छोटी-सी झोंपड़ी से की थी। वह भी तो कभी स्लम-एरिया में ही रहकर अपनी गुजर-बसर किया करता था और लैम्प-पोस्ट के नीचे टाट के बोरे पर बैठकर ही तो अक्सर गणित के सवाल किया करता था।
 Ø   बाल-उपन्यास की हर घटना अपने आप में रोचक बन पड़ी है और पाठक-गण को चिन्तन, मनन और सोचने के लिये विवश करेगी।
-आनन्द विश्वास 

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Friday, 1 September 2017

छूमन्तर मैं कहूँ...

छूमन्तर मैं कहूँ...
आनन्द विश्वास

छूमन्तर मैं कहूँ और फिर,
जो चाहूँ बन जाऊँ।
काश, कभी पाशा अंकल सा,
जादू मैं कर पाऊँ।

हाथी को मैं कर दूँ गायब,
चींटी उसे बनाऊँ।
मछली में दो पंख लगाकर,
नभ में उसे उड़ाऊँ।

और कभी खुद चिड़िया बनकर,
फुदक-फुदक उड़ जाऊँ।
रंग-बिरंगी तितली बनकर,
फूली नहीं समाऊँ।

प्यारी कोयल बनकर कुहुकूँ,
गीत मधुर मैं गाऊँ।
बन जाऊँ मैं मोर और फिर,
नाँचूँ, मेघ बुलाऊँ।

चाँद सितारों के संग खेलूँ,
घर पर उन्हें बुलाऊँ।
सूरज दादा के पग छूकर,
धन्य-धन्य हो जाऊँ।

अपने घर को, गली नगर को,
कचरा-मुक्त बनाऊँ।
पर्यावरण शुद्ध करने को,
अनगिन वृक्ष लगाऊँ।

गंगा की अविरल धारा को,
पल में स्वच्छ बनाऊँ।
हरी-भरी धरती हो जाए,
चुटकी अगर बजाऊँ।

पर जादू तो केवल धोखा,
कैसे सच कर पाऊँ।
अपने मन की व्यथा-कथा को,
कैसे किसे सुनाऊँ।


***

Thursday, 17 August 2017

*पाँच-सात-पाँच*

*पाँच-सात-पाँच*
(कुछ हाइकु)
1. 
हमने माना
पानी नहीं बहाना
तुम भी मानो।
2.
छेड़ोगो तुम
अगर प्रकृति को
तो भुगतोगे।
3.
जल-जंजाल
न बने जीवन का
जरा विचारो।
4.
सूखा ही सूखा
क्यों है चारों ओर
सोचो तो सही।
5.
पानी या खून
हर बूँद अमूल्य
मत बहाओ। 
 6.
खून नसों में
बहता अच्छा, नहीं
सड़क पर।
7.
सुनो सब की
सोचो समझो और
करो मन की
8.
घड़ी की सुईं
चलकर कहती
चलते रहो।
9.
रोना हँसना
बोलो, कौन सिखाता
खुद आ जाता।
10.
सूखा ही सूखा
प्यासा मन तरसा
हुआ उदासा।
11.
भ्रष्टाचार से
देश को बचाएंगे
संकल्प करें।
12.
आतंकवाद
समूल मिटाना है
मन में ठानें।
13.
नैतिक मूल्य
होते हैं सर्वोपरि
मन से मानें।
14.
गेंहूँ जौ चना
कैसे हो और घना
हमें सोचना।
15.
मन की बात
सोचो, समझो और
मनन करो।
16.
देश बढ़ेगा
अपने दम पर
आगे ही आगे।
17.
अपना घर
तन-मन-धन से
स्वच्छ बनाएं।
18.
विद्या मन्दिर
नारों का अखाड़ा है
ये नज़ारा है।
19.
सब के सब
एक को हटाने में
एक मत हैं।
20.
पहरेदार
हटे, तो काम बने
हम सब का।
21.
नहीं सुहाते
हमको दोनों घर
बिन कुर्सी के।
22.
नारी सुरक्षा
आकाश हुआ मौन
मत चिल्लाओ।
23.
सूखा ही सूखा
बादल हैं लाचार
रोती धरती
24.
दीप तो जले
उजाला नहीं हुआ
दीप के तले।
25.
जागते रहो
कह कर, सो गया
पहरेदार।
...आनन्द विश्वास