Thursday, 26 April 2012

बुरा न बोलो बोल रे.


बुरा न बोलो बोल रे.
.....आनन्द विश्वास.
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे,
वाणी में मिसरी तो घोलो,  बोल-बोल को तोल रे।
मानव  मर जाता है लेकिन,
शब्द  कभी  ना   मरता  है।
शब्द-बाण से आहत मन का,
घाव  कभी  ना   भरता  है।
सौ-सौ बार सोच कर बोलो, बात यही अनमोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
पांचाली  के  शब्द-बाण से,
कुरूक्षेत्र   रंग  लाल  हुआ।
जंगल-जंगल  भटके पांडव,
चीरहरण, क्या हाल  हुआ।
अच्छा  बोल सको तो बोलो, वर्ना मुँह मत खोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
जो   देखोगे   और  सुनोगे,
वैसा  ही  मन  हो जायेगा।
अच्छी  बातें, अच्छा दर्शन,
जीवन  निर्मल हो जायेगा।
अच्छा मन,सबसे अच्छा धन, मनवा जरा टटोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
कोयल  बोले  मीठी वाणी,
कानों   में   रस   घोले  है।
पिहु-पिहु मन मोर नाचता,
सबके   मन   को  मोहे  है।
खट्टी अमियाँ  खाकर मिट्ठू,  मीठा-मीठा  बोल  रे।
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।

(काव्य-माधुरी संस्थान कनाडा द्वारा आयोजित 
कवि-सम्मेलन में श्री सुरेन्द्र पाठक जी 
द्वारा किया गया मेरी कविता 
*बुरा न बोलो बोल रे* 
का काव्य-पाठ।) 

                                   .....आनन्द विश्वास.


Friday, 20 April 2012

अपना घर अपना होता है


 अपना घर अपना होता है

अपना  घर   अपना  होता है,
ये जीवन का  सपना होता है।
बड़े शहर  में घर  का सपना,
केवल  इक  सपना  होता है।
बड़े   भाग्य  होते  हैं  उनके,
जिनका घर अपना  होता है।
आवक-जावक गुणा-भाग में,
जीवन भर खपना होता  है।
कुछ  सपने  आँखों  में  होते,
कुछ  पूरे  कुछ   आधे  होते।
कहीं  विवशता मजबूरी, तो 
कहीं  प्यार  के  वादे   होते।
बड़े प्यार से तिनका-तिनका,
दीवारें    चिनना   होता है।
जीवन  भर  की   आपाधापी,
इक  छोटा सा  घर  दे पाती।
कभी-कभी ऐसी कोशिश भी,
आधी  की  आधी  रह जाती।
दो   पैसे   में   एक    बचाना,
आधे पेट कभी  सोना होता है।
जिस घर को हम कहते अपना,
सच  में  तो  होता  है  सपना।
मिथ्या  जग, मिथ्या  है माया,
कुछ भी नहीं  जगत में अपना।
छोड़   झमेला   चौरासी   का,
राम   नाम   जपना  होता है। 


आनन्द विश्वास

Friday, 6 April 2012

दखलंदाजी सही नहीं.

दखलंदाजी सही नहीं.
यह कविता मेरे काव्य-संकलन 
मिटने वाली रात नहीं 
से ली गई है।

दखलंदाजी सही नहीं.
मैं  अपना  काम  करूँ,  और  तुम  अपना  काम करो,
एक   दूसरे   के  कामों  में,  दखलंदाजी   सही   नहीं।
सूरज  रोज़  सुबह  उगता है,
और  शाम को ढल जाता है।
और चंद्रमा  रोज़  शाम  को,
आ कर सुबह चला जाता है।
एक प्रकाशित  करता  जग  को,  दूजा  देता  शीतलता,
दौनों  कामों  में  निष्ठा है, क्या ऐसा  करना  सही नहीं।
नदियाँ सिंचित करतीं धरती,
धरती   देती   है   हरियाली।
वादल  ले  पानी   सागर  से,
हम  सबको   देते  खुशहाली।
जल का चक्र सदा चलता है,मौसम जिससे बदला करता
सृष्टि-चक्र  अवरोधित कर, विपति निमंत्रण सही नहीं।
राजनीति   में   निष्ठा - प्रेमी,
और समर्पित, कर्मठ जन  हों।
सेवा  जिनका  मूल - मंत्र  हो,
और सुकोमल  निर्मल मन हो।
जन-जन के मन में बस कर जो, जन सेवा का काम करें,
ऐसे  लोगों  के द्वारा  क्या, शासन-संचालन  सही नहीं?
न्यायाधीश  पंच   परमेश्वर,
निर्भय हो  कर  न्याय  करें।
शीघ्र और निष्पक्ष न्याय हो,
भ्रष्ट - कर्म   से   लोग   डरें।
भ्रष्ट, अनैतिक, व्यभिचारी  को, कभी न कोई माँफ करे,
राम-राज्य फिर से आये,  क्या ऐसा  करना  सही नहीं?

                                ......आनन्द विश्वास