Monday, 5 December 2011

चलो कहीं पर घूमा जाये


चलो कहीं पर घूमा जाये

चलो  कहीं  पर  घूमा   जाये,
थोड़ा  मन  हल्का  हो  जाये।

सबके   अपने-अपने   ग़म   हैं,
किस ग़म को कम आँका जाये।

अनहोनी   को   होना   होता,
पागल  मन  को  कौन बताये।

आँखों   में  सागर   छलका है,
खारा  जल   बहता  ही जाये।

कैसे  पल   हैं,  भीगी   पलकें,
गीली   आँखें   कौन   सुखाये।

कहाँ   गये   हैं   जाने   वाले,
चलो  किसी  से  पूछा  जाये।

आना-जाना नियति सृष्टि की,
गये  हुये   को   कौन  बुलाये।

तुम  तो  चले   गये  निर्मोही,
बीता कल, मन भुला न पाये।

                    ...आनन्द विश्वास